Category: Politics

  • 20 ट्रकों में दस्तावेज, ₹9,50,00,00,000 और देशˈ का सबसे बड़ा… जानिए, ‘चारा घोटाले’ की पूरी कहानी

    20 ट्रकों में दस्तावेज, ₹9,50,00,00,000 और देशˈ का सबसे बड़ा… जानिए, ‘चारा घोटाले’ की पूरी कहानी

    20 ट्रकों में दस्तावेज, ₹9,50,00,00,000 और देशˈ का सबसे बड़ा… जानिए, ‘चारा घोटाले’ की पूरी कहानी

    950 Crore Chara Ghotala: देश में घोटालों की कहानियां तो आपने खूब सुनी होंगी, लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं देश के सबसे चर्चित और अजब-गजब घोटाले के बारे में. इस घोटाले का नाम था- ‘चारा घोटाला’. ‘चारा घोटाला’ के नाम से मशहूर यह मामला 950 करोड़ रुपये के गबन का था, जिसने एक मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली और बिहार की राजनीति का रुख ही बदल दिया. तो चलिए आपको बताते हैं बिहार और देश के सबसे चर्चित घोटाले की कहानी.

    1970 के दशक बात है, बिहार के पशुपालन विभाग में सरकारी खर्च के नाम पर झूठे बिल बनना शुरू हुए. शुरुआत में तो छोटे स्तर की हेराफेरी थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें अफसरों, सप्लायर्स और नेताओं की मिलीभगत बढ़ती चली गई. सरकार अपने खजाने से पशुओं के चारे, दवाओं और उपकरणों के नाम पर पैसा देती. लेकिन असल में इन पैसों का इस्तेमाल कभी इन कामों में किया ही नहीं गया.

    चारा घोटाला क्या है…
    बिहार के स्थानीय पत्रकार रवि एस. झा ने पहली बार इस घोटाले को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया. उनकी रिपोर्ट में यह साफ था कि सिर्फ अधिकारी ही नहीं, बल्कि नेताओं तक की इसमें संलिप्तता है. इस खुलासे ने सारे घोटाले की पोल खोलकर रख दी. उन्होंने दिखाया कि कैसे सरकारें और ठेकेदार मिलकर बिहार के संसाधनों की लूट कर रहे थे.

    जनता के दबाव और अदालत की निगरानी में मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने केस की इस केस की जांच CBI को सौंपी. जांच शुरू होते ही कई बड़े नाम सामने आए. मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और कई IAS अधिकारी. धीरे-धीरे घोटाले का दायरा 50 से ज्यादा केसों तक फैल गया. जांच चलती रही मामले दर्ज होते रहे.

    950 करोड़ का घोटाला
    सीबीआई ने 10 मई 1997 को राज्यपाल से लालू प्रसाद यादव पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी. बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ए.आर. किदवई ने सबूतों को देखकर इस बात की इजाजत दे दी. इसी बीच लालू के करीबी अधिकारी और मंत्री भी जांच के घेरे में आ गए. मामला और बिगड़ता गया. लालू ने कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, जो खारिज कर दी गई.

    अब जैसे ही गिरफ्तारी की नौबत आई, लालू प्रसाद यादव ने 5 जुलाई 1997 को अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) बनाई और जनता दल से अलग हो गए. 25 जुलाई को उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का नया मुख्यमंत्री बना दिया.

    यहां से लालू का बुरा वक्त शुरू हो चुका था. साल 1997 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्हें रांची जेल में रखा गया. इसके बाद 1998 और 2000 में उन्हें फिर अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया और 20 ट्रकों में लाकर अदालत के सामने दस्तावेज पेश किए गए थे.

    देश के सबसे बड़े घोटाले की कहानी
    साल 2000 के बाद से चारा घोटाले से जुड़े 53 मामलों में सुनवाई शुरू हुई. मई 2013 तक 44 केसों का निपटारा हो चुका था. करीब 500 से ज्यादा आरोपी दोषी पाए गए. लालू प्रसाद यादव को कुल 14 साल की सजा हुई. फिर 6 जनवरी 2018 को साढ़े तीन साल की कैद के साथ-साथ उन पर 5 लाख का जुर्माना भी लगाया गया.

    लालू की कुर्सी क्यों गई थी
    चारा घोटाला मामले में सीबीआई ने कुल 66 मामले दर्ज किए. इनमें से 53 झारखंड और बाकी बिहार में ट्रांसफर हुए. चारा घोटाले के कुल 5 मामले हैं. पांच मामलों में लालू यादव को दोषी ठहराया गया है और उन्हें सजा मिली है. छठे मामले में अब भी सुनवाई हो रही है. यह ऐसा मामला है, जिसके चलते लालू की कुर्सी चली गई थी. उनके सीएम रहते ही यह घोटाला हुआ था.

    चाईबासा कोषागार केस: 37.70 करोड़ रुपये का गबन और लालू यादव को 5 साल की सजा.
    देवघर कोषागार केस: 89.27 लाख रुपये का गबन और लालू यादव को 3.5 साल की सजा. फाइन- 10 लाख.
    चाईबासा दूसरा केस: 33.13 करोड़ रुपए का गबन और लालू यादव को 5 साल की सजा.
    दुमका कोषागार केस: 3.13 करोड़ रुपये का गबन और लालू यादव को 14 साल की सजा (7+7 साल). फाइन- 60 लाख.
    डोरंडा कोषागार केस: 139.35 करोड़ रुपये का गबन और लालू यादव को 5 साल सजा. फाइन- 60 लाख.
    रांची कोषागार (छठा मामला): 1.84 करोड़ रुपये का गबन. अभी सुनवाई जारी है.

    लालू प्रसाद यादव पर क्या केस चल रहा है
    अगर इन सभी मामलों के गबन को जोड़ दिया जाए तो लालू यादव की देनदारी करीब 304 करोड़ रुपए होगी.  इसका मतलब है कि अगर बिहार सरकार कोर्ट में अपना दावा मजबूती से रखती है और कोर्ट पैसा जमा करने का आदेश देता है तो लालू यादव को इतने पैसे सरकारी खजाने में देने होंगे.

  • प्रियंका गांधी को जब सिर्फ 13 सालˈ की उम्र हो गया था प्यार: इस शख्स को देखते ही दे बैठी थी दिल

    प्रियंका गांधी को जब सिर्फ 13 सालˈ की उम्र हो गया था प्यार: इस शख्स को देखते ही दे बैठी थी दिल

    कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से शायद आप में से कई लोगों ना जानते हों। उन्हीं में एक है उनकी वो लव स्टोरी जो सिर्फ 13 साल की उम्र में शुरू हो गई थी। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बेटी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पोती बचपन से ही बेहद खूबसूरत रही हैं। बचपन की बेबी डॉल जब स्कूल में पहुंची तो एक हैंडसम ब्वॉय उन पर इतना मोहित हुआ कि वो प्रियंका को प्रपोज किए बिना नहीं रह पाया। प्रियंका को प्रपोज करने वाला वो लड़का कौन था और प्रियंका ने उसके प्रपोजल पर किया जवाब दिया आपको आगे बताएंगे।

    प्रियंका गांधी को जब सिर्फ 13 सालˈ की उम्र हो गया था प्यार: इस शख्स को देखते ही दे बैठी थी दिल

    स्कूल में शुरू हुई प्रियंका की लव स्टोरी – प्रियंका गांधी को प्रपोज करने वाले लड़के के नाम के बारे में सस्पेंस खत्म करते हैं, और आपको बताते हैं उस लकी ब्वॉय का नाम। स्कूल में प्रियंका गांधी को प्रपोज करने वाले लड़के का नाम था- रॉबर्ट वाड्रा। जी हां वही राबर्ट वाड्रा जो अब प्रियंका गांधी के पति हैं. और दोनों के दो बच्चे भी हैं। आगे आपको बताएंगे कि प्रियंका के लिए दीवाने हो चुके रॉबर्ट ने उन्हें कैसे प्रपोज किया।

    मुझसे शादी करोगी? स्कूल में एक साथ पढ़ने के दौरान जब रॉबर्ट और प्रियंका की एक दूसरे के लिए अच्छी समझ बन गई, तो दोनों के मुलाकातों का दौर शुरू हो गया। लेकिन प्रियंका के प्यार में दीवाने बनते जा रहे रॉबर्ट से ज्यादा इंतजार नहीं करते बना और उन्होंने एक दिन खुद प्रियंका गांधी के सामने सीधे ही शादी करोगी वाला सवाल पूछा लिया।

    फिर क्या था रॉबर्ट की दीवानगी और उनके प्रपोज करने के अंदाज को देखकर प्रियंका कैसे ना कर सकती थीं, उन्होंने भी तुरंत हामी भर दी। फिर 18 फरवरी 1997 में दोनों ने मां सोनिया गांधी के घर दस जनपथ पर सात फेरे लिए। आगे आपको बताएंगे कि प्रियंका गांधी ने रॉबर्ट वाड्रा की तारीफ में क्या कहा।

    प्रियंका को भा गई थी रॉबर्ट की सादगी – रॉबर्ट देश के किसी बहुत बड़े बिजनेसमैन या राजनीतिक परिवार से नहीं जुड़े थे, लेकिन उन्होंने अपनी सादगी से प्रियंका का दिल जीत लिया था। प्रियंका गांधी अक्सर कहती भी हैं कि “जब मैं रॉबर्ट से पहली बार मिली तो उन्होंने मुझे अलग तरह से ट्रीट नहीं किया जो मुझे बेहद अच्छा लगा। आपस में यही समझ आज भी हर समय दोनों को एक-दूसरे के साथ खड़ा रखती है। आगे आपको रॉबर्ट वाड्रा के बैकग्राउंड के बारे में भी बताएंगे।

    मुरादाबाद से ताल्लुक रखते हैं रॉबर्ट वाड्रा – प्रियंका गांधी से करीब तीन साल बड़े रॉबर्ट वाड्रा का जन्म 18 अप्रैल 1969 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में हुआ था। राजनीतिक पृष्ठभूमि से दूर-दूर तक नाता नहीं रखने वाले रॉबर्ट वाड्रा के परिवार का पीतल और आर्टिफिशल ज्वैलरी का बिजनेस है। वाड्रा परिवार वैसे तो मूलत: पाकिस्तान के सियालकोट से है, लेकिन भारत विभाजन के दौरान उनका परिवार यहां आकर बस गया था।

    दिलचस्प बात यह है कि गांधी परिवार में लव मैरिज करने की परंपरा रही है। उनके पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी की लव स्टोरी भी काफी चर्चा में रही थी। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रियंका गांधी ने भी लव मैरिज को ही चुना। आज प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा अपने दो बच्चों-मिराया वाड्रा और रेहान वाड्रा- के साथ सामाजिक जीवन की जिम्मेदारियां निभाते हुए खुशहाल परिवारिक जीवन भी व्यतीत कर रहे हैं।

  • न अमेरिका-चीन न जर्मनी-जापान… भारत कैसे करˈ गया ये काम इस रफ्तार से हर कोई हैरान

    न अमेरिका-चीन न जर्मनी-जापान… भारत कैसे करˈ गया ये काम इस रफ्तार से हर कोई हैरान

    न अमेरिका-चीन न जर्मनी-जापान… भारत कैसे करˈ गया ये काम इस रफ्तार से हर कोई हैरान

    अमेरिका, चीन हो या जर्मनी और जापान, कोई भारत की तरक्की की रफ्तार के आसपास भी नहीं है। मुश्किल समय में भी भारत ने अपनी आर्थिक तेजी को कायम रखा है। इस ग्रोथ ने दुनिया को हैरान कर दिया है।

    विश्व बैंक का कहना है कि आने वाले सालों में भी भारत की तरक्की की रफ्तार अच्छी रहेगी। भले ही दुनिया की बाकी अर्थव्यवस्थाएं थोड़ी धीमी पड़ जाएं। लेकिन, भारत की चाल बनी रहेगी।

    विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की तरक्की थोड़ी कम होकर 6.3% रह सकती है। पहले जनवरी में अनुमान लगाया गया था कि यह 6.7% रहेगी। फिर भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। भारत 2015 में चीन को पीछे छोड़ सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस समय तेल की कीमतें कम थीं। देश में आर्थिक स्थिति स्थिर थी। सरकार ने कई बड़े सुधार किए थे।

    मुश्‍क‍िलों के बीच भी बनाए रखी रफ्तार
    2015 से 2018 के बीच भारत की जीडीपी 7.5% से 8% के बीच बढ़ी। वहीं, चीन की तरक्की 6.5% से 6.7% तक धीमी हो गई थी क्योंकि वह निवेश की जगह लोगों के खर्च पर ज्यादा ध्यान दे रहा था। इस दौरान सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कई कार्यक्रम शुरू किए, एफडीआई के नियमों को आसान बनाया और पैसे के मामले में सुधार किए। 2017 में जीएसटी लागू किया गया। इससे पूरे देश में एक जैसा टैक्स सिस्टम बना।

    हालांकि, 2019 और 2020 में भारत को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 2018 के अंत और 2019 में बैंकों और NBFC में परेशानी आने लगी। लोगों ने कम चीजें खरीदीं और निजी कंपनियों ने भी कम निवेश किया। वित्त वर्ष 2019-20 में GDP की वृद्धि दर गिरकर 5% हो गई, जबकि पिछले साल यह 6.1% थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दुनिया की आर्थिक स्थिति खराब थी। कंस्ट्रक्शन का काम धीमा हो गया था। लोगों ने कम चीजें खरीदीं और बैंकों को भी दिक्कतें हो रही थीं।

    2020 में कोरोना महामारी आई। इससे अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा नुकसान हुआ। वित्त वर्ष 2020-21 में GDP 7.3% तक गिर गई, जो आजादी के बाद सबसे खराब प्रदर्शन था। लेकिन, भारत ने वित्त वर्ष 2021-22 में जोरदार वापसी की और 8.7% की ग्रोथ हासिल की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों ने खूब खरीदारी की, सरकार ने भी खूब खर्च किया और सेवाओं और निर्यात में भी सुधार हुआ। 2022 से भारत लगातार 6-7% की दर से बढ़ रहा है, जबकि दुनिया के कई बड़े देशों के साथ चीन की अर्थव्यवस्था धीमी हो गई है। विश्व बैंक, IMF और UN ने भी कहा है कि 2021 से भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। वित्त वर्ष 2025-26 तक यह इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा।

    आने वाले सालों में भी सबसे तेजी से बढ़ेगा भारत
    यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत आने वाले सालों में भी सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। यह चीन, अमेरिका, यूरोप और जर्मनी जैसे देशों से भी आगे रहेगा। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत की आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत है।

    दुनिया की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है, लेकिन भारत स्थिर है। अनुमान है कि 2025 में दुनिया की अर्थव्यवस्था सिर्फ 2.3% की दर से बढ़ेगी, जो पहले के अनुमान से कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कई देशों के बीच व्यापार को लेकर तनाव है। अमेरिका और चीन के बीच भी रिश्ते ठीक नहीं हैं, जिससे व्यापार में दिक्कतें आ रही हैं। विश्व बैंक का कहना है कि 2025 में दुनिया का व्यापार 2% से भी कम बढ़ेगा, जबकि पहले यह 4-5% की दर से बढ़ता था।

    दुनिया के कई बड़े बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। इससे लोगों का खर्च और कंपनियों का निवेश कम हो गया है। यूक्रेन में युद्ध जारी है। अमेरिका और चीन के बीच तनाव है। साथ ही ऊर्जा की आपूर्ति में भी दिक्कतें आ रही हैं। इससे निवेशकों का भरोसा कम हुआ है। जर्मनी और जापान जैसे देशों में बूढ़े लोगों की संख्या बढ़ रही है। उत्पादन कम हो रहा है। नई चीजें भी कम बन रही हैं। इससे उनकी अर्थव्यवस्था धीमी हो गई है।

    अमेर‍िका, चीन, यूरोप… सब पड़ गए हैं ठंडे
    विश्व बैंक के अनुसार, अमेरिका की अर्थव्यवस्था 2025 में 1.4% की दर से बढ़ेगी, जो जनवरी में अनुमानित 2.3% से कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्याज दरें बढ़ने का असर अब दिख रहा है। महंगाई की वजह से लोग कम चीजें खरीद रहे हैं। चुनाव की वजह से सरकार भी कम निवेश कर रही है।

    चीन की अर्थव्यवस्था 2025 में 4.5% की दर से बढ़ेगी, जो पहले जितनी तेज नहीं है। हालांकि, सरकार के पास अभी भी कई तरीके हैं जिनसे वह अर्थव्यवस्था को सुधार सकती है। लेकिन, चीन को रियल एस्टेट में दिक्कतें आ रही हैं। काम करने वाले लोगों की संख्या कम हो रही है। दूसरे देशों के साथ उसके रिश्ते भी खराब हो रहे हैं, जिससे लोग चीन में निवेश करने से डर रहे हैं।

    यूरोप की अर्थव्यवस्था सिर्फ 1% की दर से बढ़ने के आसार हैं। रूस पर प्रतिबंध लगने के बाद ऊर्जा की कमी हुई है। चीजों के दाम बढ़ गए हैं। इससे उत्पादन कम हो रहा है। जर्मनी ज्यादातर चीन को चीजें बेचता है, लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था धीमी होने की वजह से जर्मनी को भी नुकसान हो रहा है। जर्मनी ने अभी तक पर्यावरण को बचाने के लिए ज्यादा निवेश नहीं किया है। इससे आने वाले समय में उसे और भी नुकसान हो सकता है।

    भारत क्यों अलग है?अनुमान है कि भारत की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2025-26 में 6.3% की दर से बढ़ेगी। यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था दूसरे देशों से अलग है। भारत दूसरे देशों को चीजें बेचने पर ज्यादा निर्भर नहीं है, बल्कि यहां लोग खुद ही खूब खरीदारी करते हैं। भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ रही है, शहर बढ़ रहे हैं और लोगों की आमदनी भी बढ़ रही है। इससे लोग खूब खरीदारी करते हैं और अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं होता है।

    भारत में युवाओं की संख्या ज्यादा है। यहां के लोगों की औसत उम्र 29 साल है। इससे काम करने वाले लोगों की संख्या के साथ उत्पादन भी बढ़ रहा है। वहीं, यूरोप, चीन और जापान में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है। इससे उनकी अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है। सरकार सड़कें, रेलवे, ऊर्जा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी चीजों पर खूब पैसा खर्च कर रही है। इससे अर्थव्यवस्था को बहुत फायदा हो रहा है। इस निवेश की वजह से निजी कंपनियां भी आगे आ रही हैं। चीजें बनाने और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में निवेश कर रही हैं।

  • PM मोदी के बाद कौन बनेगा प्रधानमंत्री?ˈ ज्योतिष के अनुसार इन 3 नेताओं की किस्मत चमक रही है

    PM मोदी के बाद कौन बनेगा प्रधानमंत्री?ˈ ज्योतिष के अनुसार इन 3 नेताओं की किस्मत चमक रही है

    PM मोदी के बाद कौन बनेगा प्रधानमंत्री?ˈ ज्योतिष के अनुसार इन 3 नेताओं की किस्मत चमक रही है

    भारत की सियासत में इन दिनों एक सवाल हर किसी के मन में कौंध रहा है- नरेंद्र मोदी के बाद देश की बागडोर कौन संभालेगा? जहां राजनीति के जानकार अपने-अपने कयास लगा रहे हैं, वहीं ज्योतिष की दुनिया भी इस रहस्य को सुलझाने में पीछे नहीं है।

    ग्रह-नक्षत्रों की चाल और कुंडली के खेल के आधार पर तीन बड़े नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, जिनके सितारे इस वक्त बुलंदी पर नजर आते हैं। आइए, इस रोचक सवाल का जवाब तलाशते हैं और जानते हैं कि ज्योतिष की नजर में अगला प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में कौन सबसे आगे है।

    सियासत और सितारों का अनोखा मेल

    भारतीय राजनीति में ज्योतिष का दखल कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से ही राजा-महाराजा अपने फैसलों के लिए ज्योतिषियों की सलाह लेते थे, और आज भी यह परंपरा कायम है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पिछले एक दशक में शानदार प्रदर्शन किया है, लेकिन अब सवाल यह है कि उनके बाद पार्टी किसे अपना चेहरा बनाएगी? ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों की चाल कुछ खास नेताओं के पक्ष में है। इनमें से तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, जिनकी कुंडली में सत्ता और सफलता के योग बनते दिख रहे हैं।

    पहला दावेदार: योगी आदित्यनाथ

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम इस सूची में सबसे ऊपर लिया जा रहा है। ज्योतिषियों के मुताबिक, उनकी कुंडली में शनि और गुरु की मजबूत स्थिति उन्हें नेतृत्व के लिए मजबूत दावेदार बनाती है। योगी की सख्त छवि और हिंदुत्व की राजनीति उन्हें बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय बनाती है। ग्रहों की दशा बताती है कि अगले कुछ साल उनके लिए सुनहरे हो सकते हैं, और अगर सितारे मेहरबान रहे तो वह देश के शीर्ष पद तक पहुंच सकते हैं। क्या योगी का कद अब राष्ट्रीय स्तर पर और बड़ा होने वाला है? यह सवाल हर किसी के मन में है।

    दूसरा नाम: नितिन गडकरी

    बीजेपी के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। उनकी कुंडली में सूर्य और मंगल की शुभ स्थिति उन्हें एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी नेता के रूप में पेश करती है। गडकरी ने सड़क परिवहन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में शानदार काम किया है, जिसकी वजह से उनकी साख पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह मजबूत है। ज्योतिषियों का मानना है कि उनकी मेहनत और ग्रहों का साथ उन्हें अगले प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ले जा सकता है। क्या गडकरी का सादगी भरा अंदाज सत्ता की सीढ़ी चढ़ेगा? यह देखना दिलचस्प होगा।

    तीसरा दावेदार: अमित शाह

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। उनकी रणनीति और संगठन कौशल ने पार्टी को कई बड़ी जीत दिलाई हैं। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, उनकी कुंडली में राहु और चंद्रमा की स्थिति उन्हें सत्ता के करीब रखती है। शाह की मेहनत और मोदी के साथ उनकी करीबी उन्हें इस दौड़ में मजबूत बनाती है। हालांकि, कुछ ज्योतिषी मानते हैं कि उनकी राह में कुछ ग्रह बाधा भी डाल सकते हैं। क्या शाह का सियासी दांव उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुंचाएगा? यह वक्त ही बताएगा।

    सितारों का खेल या मेहनत का फल?

    ज्योतिष भले ही भविष्य की एक झलक दिखाए, लेकिन सियासत में मेहनत, रणनीति और जनता का भरोसा ही असली जीत दिलाता है। इन तीनों नेताओं के पास अनुभव, लोकप्रियता और संगठन की ताकत है, लेकिन कौन बाजी मारेगा, यह कहना अभी मुश्किल है। ग्रह-नक्षत्रों की चाल बदलती रहती है, और राजनीति का मिजाज भी। फिर भी, यह चर्चा हर किसी को उत्साहित कर रही है कि आने वाले दिनों में भारत का नेतृत्व किसके हाथों में होगा। आपकी राय में इनमें से कौन सबसे मजबूत दावेदार है?

  • इसी इंसान के कारण योगी आदित्यनाथ नेˈ त्याग दिया था सब कुछ देखिए गुरु-शिष्य की अनदेखी तस्वीरें

    इसी इंसान के कारण योगी आदित्यनाथ नेˈ त्याग दिया था सब कुछ देखिए गुरु-शिष्य की अनदेखी तस्वीरें

    इसी इंसान के कारण योगी आदित्यनाथ नेˈ त्याग दिया था सब कुछ देखिए गुरु-शिष्य की अनदेखी तस्वीरें

    5 जून 1972 को उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में जन्मे योगी आदित्यनाथ का असली नाम अजय मोहन बिष्ट है। स्कूल के दिनों से ही योगी आदित्यनाथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में कार्यरत थे और शुरूआत से ही उनका लगाव हिंदुत्व के प्रति था।

    विद्यार्थी परिषद के हर कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ शामिल होते थे। स्कूल के बाद उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित में बीएससी किया, वे अपने कॉलेज के दिनों में लगातार सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया करते थे। स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने महज 22 साल की उम्र में अपने घर परिवार का त्याग कर दिया और गोरखपुर के तपस्थली के होकर रह गए।

    अवैद्यनाथ ऐसे हुए थे आदित्यनाथ से प्रभावित

    सीएम योगी आदित्यनाथ जब स्कूल में थे, तो लगातार वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेते थे, उन प्रतियोगिताओं में तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए जाते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम में महंत अवैद्यनाथ पहुंचे थे, जहां उन्होंने योगी आदित्यनाथ का भाषण सुना, उस भाषण से अवैद्यनाथ काफी प्रभावित हुए। इस कार्यक्रम के बाद अवैद्यनाथ ने उन्हें बुलाकर पूछा कि कहां के रहने वाले हो? कहां से आए हो? इसके बाद दोनों के बीच बातचीत हुई और आखिर में अवैद्यनाथ ने आदित्यनाथ को गोरखपुर आने का न्योता दिया।

    ऐसे बने अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी

    आपको जानकर हैरानी होगी कि अवैद्यनाथ भी उत्तराखंड के ही रहने वाले थे और उनका गांव भी आदित्यनाथ के गांव से महज 10 किलोमीटर दूर था। खैर, महंत अवैद्यनाथ के न्योते पर योगी आदित्यनाथ गोरखपुर पहुंचे और वहां कुछ दिन रूकने के बाद वापस अपने गांव लौट गए। इसके बाद उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए ऋषिकेश के ललित मोहन शर्मा महाविद्यालय में दाखिला लिया, लेकिन उनका मन अब पढ़ाई में नहीं था बल्कि उनका मन अब गोरखपुर की तप स्थली की ओर था। इसी बीच महंत अवैद्यनाथ बीमार पड़ गए और इसकी खबर मिलते ही योगी तुरंत गोरखपुर पहुंच गए।

    जब योगी आदित्यनाथ गोरखपुर पहुंचे, तो वहां देखा कि महंत काफी बीमार हैं। इसके बाद महंत ने योगी को अपने पास बुलाया और कहा कि हम अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, मेरी हालत अब काफी बिगड़ रही है और मुझे कुछ हो गया तो मेरे इस मंदिर को देखने के लिए कोई नहीं है।

    महंत अवैद्यनाथ की बात सुनकर योगी काफी भावुक हो गए और उन्होंने कहा कि आप चिंता ना करें, आपको कुछ नहीं होगा, मैं जल्द ही गोरखपुर आउंगा। इसके कुछ ही दिनों बाद योगी आदित्यनाथ अपने घर से नौकरी का बहाना कर गोरखपुर की तपस्थली की ओर निकल पड़े और वहां महंत अवैद्यनाथ की शरणों में रहे। इसके बाद उन्हें महंत ने अपना उत्तराधिकारी बनाया और फिर योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के ही होकर रह गए।

    ऐसे हुई राजनीति में एंट्री

    योगी आदित्यनाथ के गुरू अवैद्यनाथ ने साल 1998 में राजनीतिक जीवन से संन्यास ले लिया और योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यहीं से योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक करियर शुरू हुआ। बता दें कि वे गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर के महंत हैं, इसी मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ थे, जिन्होंने अपना उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को चुना था। खैर, साल 1998 में योगी ने गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव लड़ा और यहां से जीतकर सीधे संसद पहुंच गए। दिलचस्प बात ये थी कि उस समय वे महज 26 साल के थे और सबसे कम उम्र के सांसद बने थे।

    साल 1998 से योगी आदित्यनाथ लगातार गोरखपुर लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वे इस सीट से 5 बार सांसद चुने जा चुके हैं। हालांकि साल 2016 में जब उन्हें उत्तर प्रदेश का सीएम बनाया गया, तो सांसद पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बता दें कि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश बीजेपी का एक बड़ा चेहरा हैं और उत्तर भारत की राजनीति के कद्दावर नेताओं में से एक हैं।

  • राजा मानसिंह का वो रहस्यमयी खजाना जिसˈ पर बिगड़ गई थी इंदिरा गांधी की नियत। पाकिस्तान तक पहुंचा था मामला

    राजा मानसिंह का वो रहस्यमयी खजाना जिसˈ पर बिगड़ गई थी इंदिरा गांधी की नियत। पाकिस्तान तक पहुंचा था मामला

    राजा मानसिंह का वो रहस्यमयी खजाना जिसˈ पर बिगड़ गई थी इंदिरा गांधी की नियत। पाकिस्तान तक पहुंचा था मामला

    हम बचपन से यह सुनते आ रहे हैं कि एक समय पर भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था। इसके पीछे की वजह ये है कि, बीतें सालों पहले हमारा देश सोने का भंडार था। पहले के राजा महाराजा के पास बेशुमार दौलत थी। लेकिन बाद में विदेशी आक्रमणों के लूट जाने के बाद भारत के कई भंडार खाली हो गए।

    raja man singh

    हालांकि आज भी भारत में ऐसे कई भंडारे जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। इन्हीं में से एक राजा मानसिंह के सोने का भंडार था जिसे रातों-रात खुदवा दिया गया था। इतना ही नहीं बल्कि इस भंडार को खुदवाने के बाद पाकिस्तान ने भी अपने हिस्से की मांग कर ली थी। आइए जानते हैं राजा मानसिंह के सोने के खजाने के बारे में..

    अकबर के नवरत्नों में से एक थे राजा मानसिंह

    बता दें, राजा मान सिंह बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक थे। उन्हें प्यार से ‘राजा मिर्जा’ कहा जाता था। राजा मानसिंह ने अकबर को ऐतिहासिक युद्ध में जीत दिलाई थी। इसके अलावा उन्होंने अकबर और महाराणा प्रताप के बीच में हल्दीघाटी युद्ध में भी अहम भूमिका निभाई थी।

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    ना सिर्फ राजा मानसिंह ने बल्कि उनके पिता राजा भगवानदास ने भी अकबर के लिए कई युद्ध लड़े। ऐसे में राजा मानसिंह को अकबर ने भारत के बिहार बंगाल और उड़ीसा की सत्ता सौंपी। इस दौरान राजा मानसिंह ने कई रियासतों पर हमले किए जिसके बाद उनके पास अकूत संपत्ति जमा हुई हो गई थी।

    राजा मानसिंह ने काबुल से लुटा था सोना

    इसी बीच अकबर ने राजा मानसिंह को काबुल भेजा जहां पर उन्होंने लुटेरों से जमकर मुकाबला किया। लुटेरे से जंग लड़ने के दौरान बीरबल की मौत हो गई थी। इसी बीच राजा मानसिंह ने युसूफफजई कबीले के सरदार को मारकर बीरबल की मौत का बदला लिया। कहा जाता है कि राजा मानसिंह ने यहां के लुटेरे सरदारों से काफी खजाना लूटा था जिसमें कई हीरे जवाहरात, कई टन सोना और चांदी शामिल था। ऐसे में उन्होंने अकबर से छुपकर जयगढ़ के किले में यह खजाना छुपा दिया था।

    अरबी भाषा में लिखी पुस्तक “हफ्त तिलिस्मत-ए-अंमेरी” के मुताबिक, “आमेर में छुपे सात खजाने, में अफगानिस्तान और भारत के अलग-अलग रियासतों से लूटे खजाने के बारे जिक्र किया गया है। इसमें राजा मानसिंह के जयगढ़ किले में छिपे खजाने के बारे में भी खुलासा करते हुए लिखा गया है कि राजा मानसिंह द्वारा जयपुर स्थित आमेर किले में इतना खजाना छिपाया गया है, जिससे कई रियासतें हजारों साल तक अपना पेट पाल सकती थीं।” इस किताब के मुताबिक, “जयगढ़ किले के नीचे पानी की सात विशालकाय टंकियां बनी हुई हैं जिसमें 6 मिलियन गैलन पानी संग्रहित करने की क्षमता है। राजा मानसिंह ने खजाना यहीं छिपाया था।”

    इंदिरा गाँधी को लगी थी इस खजाने की भनक

    जयगढ़ किले में छिपे खजाने के बारे में कम ही लोग जानते थे। लेकिन अचानक साल 1976 में इसकी चर्चा होने लगी और इंदिरा गांधी को इसके बारे में पता चला। बता दें, जब इंदिरा गांधी को इसके बारे में पता चला था तब जयपुर राजघराने की महारानी गायत्री देवी से उनकी किरकिरी थी। दरअसल, गायत्री देवी ने स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवारों को तीन बार हराया था, ऐसे में गायत्री देवी और इंदिरा गांधी की बिल्कुल नहीं बनती थी।

    इसी बीच इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल घोषित की घोषणा कर दी। इस दौरान कई लोगों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसमें महारानी गायत्री देवी का नाम भी शामिल था। ऐसे में गायत्री देवी को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने सोने की खदान का पता लगाया और उसे सेना की मदद से खुदवाया।

    लेकिन बाद में उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया कि वहां पर किसी प्रकार का सोना नहीं मिला। लेकिन कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने सोने को दिल्ली सरकार के बजाय अपना बना लिया था।

    पाकिस्तान ने माँगा था हिस्सा

    इन दिनों हर जगह खजाने की चर्चा होने लगी तो पड़ोसी मुल्क यानी कि पाकिस्तान भी इसमें अपना हिस्सा मांगने के लिए आ टपका। अगस्त 1976 में पाकिस्तान के पूर्नेव प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को खत लिखकर कहा कि, “आपके यहां खजाने की खोज का काम आगे बढ़ रहा है। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि आप उस दौरान मिली संपत्ति के वाजिब हिस्से पर पाकिस्तान के दावे का ख्याल रखेंगी।”

    indira gandhi

    इस खत के बाद भारत में हर जगह इस खजाने की चर्चा होने लगी। इतना ही नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी भी कई सवालों के घेरे में घिर गई थी। ऐसे में उन्होंने तुरंत पाकिस्तान को खत लिखकर कहा कि, “हमने अपने कानूनी सलाहकारों से कहा था कि वह आपके द्वारा पाकिस्तान की तरफ से किए गए दावे का अध्ययन करें।

    उनका साफ-साफ कहना है कि आपके द्वारा इस दावे का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। वैसे भी यहां कोई खजाना नहीं मिला है।” इसके बाद ये मामला ठंडा पड़ गया। वहीं भारत सरकार ने भी इस खजाने की छानबीन नहीं की। ऐसे में राजा मानसिंह का ये खजाना लोगों के लिए दोबारा से रहस्यमयी बन गया।