Category: Gazab

  • एक ऐसा अनोखा तालाब, जहां मछलियों कोˈ रोजाना खिलाई जाती है 5,000 किलो मिर्च, वजह जान दिमाग घूम जाएगाˌ

    एक ऐसा अनोखा तालाब, जहां मछलियों कोˈ रोजाना खिलाई जाती है 5,000 किलो मिर्च, वजह जान दिमाग घूम जाएगाˌ

    एक ऐसा अनोखा तालाब, जहां मछलियों कोˈ रोजाना खिलाई जाती है 5,000 किलो मिर्च, वजह जान दिमाग घूम जाएगाˌ

    दुनिया में खेती-पानी से जुड़ी कई अनोखी बातें सुनने को मिलती हैं, लेकिन चीन के इस तालाब की कहानी सच में चौंका देती है. आपने शायद कभी मिर्च पसंद करने वाले इंसान देखे होंगे, लेकिन क्या आपने मिर्च खाने वाली मछलियां सुनी हैं? चीन में एक ऐसा तालाब है जहां रोजाना 5,000 किलो लाल मिर्च मछलियों को खिलाई जाती है—हां, बिल्कुल सही पढ़ा आपने! यही वजह है कि यह तालाब इंटरनेट पर धूम मचा रहा है. अब आइए जानते हैं, इस तालाब के बारे में विस्तार से.

    दरअसल, चीन के चांग्शा (हुनान प्रांत) में एक 10 एकड़ का मछली तालाब है जो इन दिनों सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा में है. कारण बेहद अनोखा है यहां की मछलियों को रोजाना अलग-अलग तरह की ताजी लाल मिर्चें खिलाई जाती हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, इस तालाब को दो लोग मिलकर चलाते हैं- जियांग शेंग, 40 साल के अनुभवी मछली पालक और उनके स्कूल के समय के दोस्त कुआंग के दोनों का कहना है कि तालाब में करीब 2,000 से ज्यादा मछलियां हैं और ये हर दिन बड़ी मात्रा में मिर्च खाती हैं.

    रोजाना 5,000 किलो मिर्च
    SCMP के अनुसार, मछलियों को भी इंसानों वाली ही मिर्चें खिलाई जाती हैं- कोन पेपर (Cone peppers) और मिलेट पेपर (Millet peppers) मिर्च खाने से मछलियों के शरीर का शेप और भी अच्छा हो जाता है, मांस ज्यादा स्वादिष्ट और सॉफ्ट बनता है और मछलियों की स्केल्स चमकदार और सुनहरी दिखती हैं. शुरुआत में मछलियां मिर्च खाने से हिचकती थीं, लेकिन अब वो घास से ज्यादा मिर्च पसंद करती हैं.

    मछलियों को मिर्च से नुकसान नहीं होता?
    SCMP के अनुसार, मछली पालने वाले जियांग बताते हैं मछलियों के टेस्ट बड्स इंसानों जैसे नहीं होते. वो स्वाद से ज्यादा सूंघकर खाना पहचानती हैं. इसलिए तीखापन उन्हें परेशान नहीं करता. वो कहते हैं कि मिर्च में मौजूद विटामिन और कैप्सैसिन मछलियों के लिए फायदेमंद हैं. इससे मछलियों का पाचन बेहतर होता है, ग्रोथ भी तेजी से होती है, बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और परजीवी मछली के शरीर पर चिपक नहीं पाते. इसलिए मिर्च आम फीड का सस्ता और पौष्टिक विकल्प बन गई हैं. स्थानीय किसान भी अपनी बची हुई या खराब होने वाली मिर्चें मुफ्त में तालाब वालों को दे देते हैं. इससे घास उगाने और काटने का खर्च भी बच जाता है.

    लोग करने लगे मजेदार कमेंट
    यह अनोखा तालाब वायरल होने के बाद इंटरनेट पर मजेदार प्रतिक्रियाएं आने लगीं. एक यूजर ने लिखा- “हुनान की मिर्चीदार हवा में पैदा हुई मछलियां भी तीखी हो गईं!” दूसरे ने लिखा- “कहीं इंसानों से ज्यादा मिर्च तो मछलियां नहीं खा रही?” तीसरे ने बड़े ही मजाकिया अंदाज में लिखा- “सीधे प्री-सीजन्ड मछली तैयार- बस पकाओ और खाओ!” तालाब अब स्थानीय लोगों के लिए एक आकर्षण का केंद्र बन चुका है और कई लोग यहां मछली पकड़ने भी आने लगे हैं.

  • दीमक से परेशान हैं? मात्र 10 रुपयेˈ में बनाएं यह शक्तिशाली इंजेक्‍शन… बस लगाते ही जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ेंगीˌ

    दीमक से परेशान हैं? मात्र 10 रुपयेˈ में बनाएं यह शक्तिशाली इंजेक्‍शन… बस लगाते ही जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ेंगीˌ

    दीमक से परेशान हैं? मात्र 10 रुपयेˈ में बनाएं यह शक्तिशाली इंजेक्‍शन… बस लगाते ही जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ेंगीˌ

    बारिश का मौसम आते ही अपने साथ ढेर सारी मुसीबतें भी ले आता है। खासतौर पर बारिश के बाद बढ़ने वाली उमस न केवल शरीर को तकलीफ पहुंचाती है, बल्कि घर में जगह-जगह दीमक का सामराज्‍य भी फैलाती है।

    आपने नोटिस किया होगा हमेशा इस मौसम में ही सबसे ज्‍यादा घर में दीमक की पैदावार होती है। जाहिर है, घर में दीमक हो ऐसा कौन ही चाहता होगा। सामान का नुकसान करने के साथ-साथ दीमक घर में बहुत गंदगी भी फैलाती है। इतना ही नहीं, दीमक के काटने से शरीर पर घाव भी हो साकता है। इसलिए जितनी जल्‍दी हो इसे घर से भगाना ही सबसे अच्‍छा सल्‍यूशन होता है। बाजार में आपको बहुत सारी दवाइयां मिल जाएंगी जो दीमक को भगाने और मारने का काम करती हैं, मगर दीमक बहुत ढीट होती हैं। हो सकता है कि दवाई के असर से वो एक बार भाग जाएं या फिर मर जाएं, मगर उनके अंडे यदि उस स्‍थान पर हैं, तो फिर से दीमक लग सकती है। यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी मगर एक रानी दीमक होती है और एक राजा दीमक होती है। रानी दीमक रोज 25 हजार से भी ज्‍यादा अंडे देती है। बाजार में आने वाली दवाओं से दीमक के अंडे नहीं मरते। ऐसे में दीमक को जड़ से खत्‍म करना है, तो रानी और राजा दीमक के साथ आपको उसके अंडों को भी नष्‍ट करना होगा। इसके लिए आज हम आपको एक शक्तिशाली इंजेक्‍शन के बारे में बताएं, जिसकी एक ही डोज में दीमक और उसके अंडे सभी नष्‍ट हो जाएंगे। इस इंजेक्‍शन में भरने वाली दवा को आप घर पर ही बहुत आसानी से तैयार कर सकती हैं।

    दीमक माने की दवा

    कुछ चीजों की गंध ऐसी होती है, जिससे दीमक को परेशानी होती और वो या तो बेहोश हो जाती हैं या फिर मर ही जाती हैं। हम आपको जो घर में दीमक मारने की दवा बनाना सिखएंगे, उसे एक बार इस्‍तेमाल करने पर ही आपको इतने अच्‍छे रिजल्‍ट्स देखने को मिलेंगी कि आप बार-बार इसका प्रयोग करेंगी-

    दीमक की दवा बनाने की सामग्री

    • 1 कप मिट्टी का तेल
    • 1 कप धतूरे का रस
    • 1 बड़ा चम्‍मच नीम का तेल
    • 1 बड़ा चम्‍मच नींबू का रस
    • 1 पुराना इंजेक्‍शन

    दीमक की दवा बनाने की विधि

    • मिट्टी का तेल लगभग सभी लोगों के घर पर होता है। यदि नहीं तो यह आपको बाजार में आसानी से मिल जाएगा। वैसे मिट्टी के तेल की जगह आप पेट्रोल का इस्‍तेमाल भी कर सकती हैं।
    • बरसात के महीने में धतूरा आपको खूब मिल जाएगा। वैसे आप 5 रुपए का धतूरा बाजार से खरीद भी सकती हैं। किसी मंदिर से आप शिव जी पर चढ़ा धतूरा भी ले सकती हैं। इसे अच्‍छी तरह से पीस लें और इसका रस निकला लें।
    • अब एक बड़ा चम्‍मच नींबू का रस लें और इसे मिट्टी के तेल और धतूरे के रस वाले मिश्रण में मिला दें। ऐसा करने के बाद आपको अब बस 1 चम्‍मच नीम का तेल इस मिश्रण में डालना है।
    • अब आप 1 पुराना यूज्‍ड इंजेक्‍शन ले लें। इसमें यह मिश्रण भरें और फिर आप इसका इस्‍तेमाल उस स्‍थान पर कर सकती हैं जहां पर दीमक लगी है।

    इसे जरूर Dimak Ki Dawa: दीवारों से लेकर घर के फर्नीचर तक को खोखला बना रही है दीमक, तो इस 4 रामबाण उपाय से करें इनका सफाया

    कैसे करें इस दीमक मारने वाले इंजेक्‍शन का इस्‍तेमाल?

    • अगर आपके घर में किसी दीवार, लकड़ी के दरवाजे या उसकी चौखट पर दीमक लगी हुई है, तो आप वहां पर इस इंजेक्‍शन को भरकर लगा सकती हैं।
    • खासतौर दीमक ने अगर दीवार और लकड़ी को खा-खाकर छेद या गड्ढा कर दिया है, तो आपको वहां पर इस दवाई को इंजेक्‍शन में भरकर डाल देना चाहिए। दरअसल स्‍प्रे करने से कई बार दवाई उड़ जाती है और उसका असर भी कम हो जाता है, मगर आप इंजेक्‍शन से जब दवाई को उसी स्‍थान पर डालती हैं, जहां दीमक लगी है तो इसका असर ज्‍यादा होता है।
    • इस इंजेक्‍शन को दीवार पर पड़ी दरारों में भी डालें क्‍योंकि उसमें अंदर जो भी दीमक होंगी वह मर जाएंगी और फिर दोबारा उस जगह दीमक नहीं होंगी।
    • इस बात का ध्‍यान रखें कि हफ्ते में एक बार आपको यह दवाई उस स्‍थान पर जरूर डालनी है, जहां पर आपको दीमक दिखाई दे रही हैं।

    इसे जरूर Termite Remedies: दीमक का जड़ से हो जाएगा सफाया, अपनाएं यह 3 सस्ते और घरेलू उपाय

    नोट- इस दवा और इंजेक्‍शन दोनों को अपने बच्‍चों की पहुंच से दूर रखें। साथ ही एक बार इंजेक्‍शन का इस्‍तेमाल करने के बाद सिरिंज की कैप लगाना न भूलें। क्‍योंकि गलती से भी यह सिरिंज आपके स्किन से टच नहीं होना चाहिए।

    उम्‍मीद है कि आपको ऊपर दी गई जानकारी पसंद आई होगी। यही छोटे-छोटे हैक्‍स आपके जीवन को आसान बनाते हैं। अगर आपके घर में भी दीमक हैं और महंगा ट्रीटमेंट कर-कर के आप परेशान हो चुकी हैं, तो ऊपर बताया गया नुस्‍खा जरूर ट्राई करके देखें।

  • सड़क पर तड़प रही थी लड़की ड्राइवरˈ ने टैक्सी बेचकर कराया इलाज बदले में लड़की ने उसके साथ जो किया वो आपको भी कर देगा हैरानˌ

    सड़क पर तड़प रही थी लड़की ड्राइवरˈ ने टैक्सी बेचकर कराया इलाज बदले में लड़की ने उसके साथ जो किया वो आपको भी कर देगा हैरानˌ

    सड़क पर तड़प रही थी लड़की ड्राइवरˈ ने टैक्सी बेचकर कराया इलाज बदले में लड़की ने उसके साथ जो किया वो आपको भी कर देगा हैरानˌ

    सड़क दुर्घटना को लेकर एक ऐसी ही खबर सामने आई जिसे पढ़कर लोगों की आंख में खुशी के आंसू आ जाएंगे।सड़क पर तड़पती रही लड़की: रोज की तरह ही एक लड़की सड़क पार करते हुए जा रही थी तभी उसका एक्सीडेंट हो गया।

    वह सड़क फर गिरी पड़ी रही। कितने ही लोग उस सड़क से गुजर रहे थे, लेकिन किसी ने भी उसकी मदद नहीं की।

    एक टैक्सी वाले की नजर उस पर पड़ी और वह उसे इस हालत में नजरअंदाज नहीं कर पाया। टैक्सी वाले ने फौरन लड़की को उठाया टैक्सी में डाला और अस्पताल ले गया। यह घटना यूपी के सहारनपुर की है जहां एक टैक्सी ड्राइवर ने लड़की की जान बचाई।

    टैक्सी ड्राइवर का नाम राजवीर है। राजवीर जब लड़की को लेकर अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टर ने कहा कि लड़की का ऑपरेशन करना पड़ेगा और उसमें दो लाख का खर्च आएगा। राजवीर के पास सोचने का समय नही था उसने फौरन अपनी टैक्सी बेच दी और ढाई लाख रुपए ले आया।

    बता दें कि राजवीर की टैक्सी ही उसकी रोजी रोजगार थी। टैक्सी चलाकर ही वह अपने परिवार का पेट पालता था औऱ हाल ही में उसने अपने लिए नई टैक्सी खरीदी थी। टैक्सी बेचकर उसने लड़की की जान बचाई और फिर ठीक होने के बाद लड़की अपने घर चली गई।

    ड्राइवर भाई को दिया सम्मान: लड़की जब पूरी तरह से ठीक हुई तो उसने राजवीर के घर जाने का मन बनाया। जब वह पता करके उसके घर पहुंची तो लड़की ने बता. कि उसकी पढ़ाई पूरी होने वाली है और उसका कॉन्वोकेशन है। लड़की का नाम आसिमा था। आसिमा ने कहा कि राजवीर को उसके इस खुशी के मौके पर आना होगा। राजवीर की घर की हालत ठीक नहीं थी उसने टैक्सी बेच दी थी, फिर भी वह आसिमा को मना नहीं कर सका।

    जब आसिमा के बुलाने पर राजवीर अपनी बूढ़ी मां के साथ यूनिवर्सिटी पहुंचा तो सबसे पीछे जाकर बैठ गया। कार्यक्रम शुरु हुआ औऱ राष्ट्रपति ने सबसे पहला नाम आसिमा का बुलाया। आसिमा को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया जाना था। आसिमा मेडल लेने के बजाए अपने मुंहबोले भाई राजवीर के पास गई और कहा कि इस गोल्ड मेडल का हकदार मेरा भाई है और अपने साथ हुआ सारी घटना को बताया। लोगों को जब यह बात पता चली तो वह भावूक हो गए।

    आसिमा ने अपने भाई को एक टैक्सी दे दी और उसके साथ रहने भी लगीं। इस तरह से हमें भी एक अच्छे नागरिक और भले आदमी की तरह जरुरत पड़ने पर किसी की भी मदद कर देनी चाहिए।

  • Milk clothes: आ गए दूध वाले कपड़े…रेशमˈ से तीन गुना सॉफ्ट, ऐसे होते हैं तैयार, एक शर्ट की कीमत भी जान लीजिएˌ

    Milk clothes: आ गए दूध वाले कपड़े…रेशमˈ से तीन गुना सॉफ्ट, ऐसे होते हैं तैयार, एक शर्ट की कीमत भी जान लीजिएˌ

    Milk clothes: आ गए दूध वाले कपड़े…रेशमˈ से तीन गुना सॉफ्ट, ऐसे होते हैं तैयार, एक शर्ट की कीमत भी जान लीजिएˌ

    Milk clothes: जिस दूध को आप फटने पर बेकार समझकर फेंक देते हैं, उसी से आज डिजाइनर साड़ी, स्टोल, कुर्ते और हाई-फैशन आउटफिट तैयार किए जा रहे हैं. ये सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन फैशन इंडस्ट्री की सबसे अनोखी और चर्चित खोज बन चुकी है.

    जिसे मिल्क फैब्रिक कहा जाता है. एक ऐसा कपड़ा जो दिखने में रेशम जैसा मुलायम और पहनने में बेहद आरामदायक होता है. दूध से बनने वाले ये कपड़ने अब ठंड से भी बचाएंगे.

    कितना दूध लगता है और क्या है कीमत?

    1 लीटर दूध से सिर्फ 10 ग्राम मिल्क फाइबर बनता है. यानी एक साधारण टी-शर्ट तैयार करने के लिए 60-70 लीटर दूध की जरूरत पड़ती है. इसी वजह से यह फैब्रिक बेहद महंगा है और प्रीमियम ब्रांड्स ही इसे इस्तेमाल कर पा रहे हैं. यही वजह है कि मार्केट में मिल्क फैब्रिक की कीमतें आसमान छू रही हैं. 1 मीटर मिल्क फैब्रिक की कीमत 15,000 से 45,000 तक है. वहीं अगर आप एक साड़ी खरीदना चाहते हैं तो इसकी कीमत 3 से 5 लाख तक हो सकती है. अब सवाल ये है कि आखिर ये इतना महंगा क्यों है, दूध का कपड़ा बनता कैसे है? और इसे कहां बनाया जा रहा है? आपके इन्हीं सवालों का जवाब लेकर हम हाजिर हुए हैं.

    कौन बना रहा है दूध वाले कपड़े?

    दुनिया तेजी से सस्टेनेबल फैशन की ओर बढ़ रही है. लोग अब प्लास्टिक से बने पॉलिएस्टर को छोड़कर ऐसे फैब्रिक चुनना चाहते हैं, जो प्रकृति को नुकसान न पहुंचाए. इसी सोच ने मिल्क फैब्रिक को जन्म दिया है. इसका पूरा श्रेय जर्मनी की एक इनोवेटिव कंपनी Qmilk को जाता है.

    Qmilk कोई साधारण फैशन ब्रांड नहीं है. ये कंपनी ताजा दूध नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल वेस्ट मिल्क इस्तेमाल करती है. यानी ऐसा दूध जो खराब हो चुका होता है और हर साल लाखों टन की मात्रा में फेंक दिया जाता है. अकेले यूरोप में ही करीब 20 लाख टन दूध हर साल बर्बाद होता है और इसी बेकार दूध को Qmilk अमूल्य फैब्रिक में बदल रही है.

    दूध से कपड़ा कैसे बनता है? (स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस)

    1. सबसे पहले दूध को फाड़ा जाता है. मतलब ये कि दूध को ऐसे प्रोसेस किया जाता है कि उसमें से ठोस हिस्सा (कर्ड) अलग हो जाए.

    2. कर्ड से केसिन प्रोटीन निकाला जाता है. यही प्रोटीन आगे जाकर फैब्रिक का बेस बनता है.

    3. केसिन को पानी में घोलकर लिक्विड बनाया जाता है, ताकि इसे मशीन में आसानी से प्रोसेस किया जा सके.

    4. इस लिक्विड को स्पिनिंग मशीन से रेशों में बदला जाता है. मशीन इसे पतले-पतले फाइबर में बदल देती है, ठीक रेशम की तरह

    5. तैयार रेशों को धागे की तरह स्पिन किया जाता है. ये फाइबर काफी मुलायम और चमकदार होते हैं.

    6. इसके बाद धागों को बुनकर कपड़ा बनाया जाता है. यह पूरी प्रोसस बिना किसी केमिकल के की जाती है. इसलिए फैब्रिक 100% बायोडिग्रेडेबल, स्किन-फ्रेंडली और इको-फ्रेंडली होता है.

    दूध से कपड़े बनाने का इतिहास बेहद पुराना है

    दूध से कपड़े बनाने का विचार जितना आधुनिक लगता है, इसकी जड़ें उतनी ही पुरानी हैं. बात साल 1930 की है, जब इटली में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से ऊन की भारी कमी हो गई थी. तब इटली के वैज्ञानिकों ने दूध की प्रोटीन से धागा बनाने का तरीका खोज निकाला था, जिसका नाम लानिटाल (Lanital) रखा गया था. लाना से मतलब ऊन था, जबकि इटालिया से इटली. बताया जाता है कि मुसोलिनी शासन के दौरान यह फैब्रिक बेहद पॉपुलर हो गया था, लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद सस्ते ऊन और सिंथेटिक फैब्रिक मार्केट में आने से लानिटाल धीरे-धीरे गायब हो गया. अब, लगभग 90 साल बाद, 2025 में इसी टेक्नोलॉजी की ग्रैंड वापसी हुई है. इस बार यह फैशन दुनिया में बड़ा बदलाव लाने की तरफ बढ़ रहा है.

    दूध से तैयार कपड़ों की खासियतें?

    रेशम से 3 गुना ज्यादा मुलायम होता है.

    एंटी-बैक्टीरियल होने के कारण पसीने की बदबू नहीं आती.

    थर्मल-रेग्युलेटेड मतलब ये सर्दी में गर्म जबकि गर्मी में ठंडक देते हैं.

    एलर्जी-फ्री है, संवेदनशील त्वचा वालों के लिए बढ़िया विकल्प.

  • स्कूल से निभा घर आते हीं सीधाˈ दादा के रूम मे जाती थी दादा भी निभा को बहुत प्यार करते थेˌ

    स्कूल से निभा घर आते हीं सीधाˈ दादा के रूम मे जाती थी दादा भी निभा को बहुत प्यार करते थेˌ

    स्कूल से निभा घर आते हीं सीधाˈ दादा के रूम मे जाती थी दादा भी निभा को बहुत प्यार करते थेˌ

    निभा स्कूल से घर आते हीं ,सीधा दादा के रूम मे जाती थी ।दादा भी निभा को बहुत प्यार करते थे ,जान से भी ज्यादा ।माँ बाप की इकलौती संतान है ,पिता दो भाई हैं ।बड़े वाले से निभा और छोटे भाई से दो लड़के हैं ।

    बड़ा ही सुखी सम्पन्न परिवार है ,बाहर से ऐसा हीं प्रतीत होता था ।

    निभा की माँ मिलनसार प्रवृत्ति की महिला हैं… आसपास के लोगो में एक अलग पहचान रखती हैं ।सब के दुख सुख में शामिल होता था ये परिवार …। दादा भी बहुत बड़े सरकारी अफसर थे और रिटायरमेंट के बाद उसी शहर में अपना दोमंजिला मकान बना लिया था ।बड़े बेटे यानी निभा का परिवार पिता के साथ ही रहता था ।

    उस दिन निभा स्कूल से जैसे ही घर आई सीधा दादा के रूम मे गई.. लेकिन ये क्या दादा जी तो कमरे में थे ही नहीं..,” कहाँ गये ?? ये सोच ही रही थी ,तभी माँ ने बताया चाचा के यहाँ घुमने गये हैं । ” मुझे क्यो नहीं बताया माँ आपने कि दादा जी चाचा के पास जाने वाले हैं ?? “

    अरे ! ” बताया तो था सुबह हीं …लगता है स्कूल जाने की जल्दी में तुझे याद नहीं रहा ।” निभा की माँ यह बोलकर सीधे रसोई में घुस जाती हैं और वहीं से आवाज लगाती हैं ,” कपड़ें बदलकर खाने की टेबल पर आ जाओ ।

    छोटी निभा स्कूल के दोस्तों के बीच दादा को भूलने लगती है ।मगर एक कसक उसके अंदर रहती थी …दादा जाते समय बिना बोले क्यो चले गये ।धीरे धीरे वक्त के आगे यादे धूंधली होने लगी ।समय का बढ़ना क्या किसी के लिए रूका है …सो यहाँ भी ना रुका ।

    आज निभा अठारह साल की हो गई है और अपने जन्मदिन पर दादा जी को नहीँ भूलती और चाचा जी के यहाँ फोन लगाती है दादाजी से बात करने के लिए ,मगर वही रटा रटाया जबाब मिलता है ,” बेटा वो तो टहलने निकले हैं आते हैं तो बात कराता हूँ ।” मगर दादा जी को गये आज आठ साल हो गये और एक दिन भी बातचीत नहीं हुई उनसे । लेकिन प्रत्येक जन्मदिन पर वो निभा को खत लिखते थे वो खत निभा को उसकी माँ लाकर देती थी ।

    निभा दादाजी के खत को घंटों सीना से लगाकर रखती और उनको याद कर रोती ।अठारहवां जन्मदिन बहुत धूमधाम से मना ।.निभा की माँ के लिए निभा ही सबकुछ थी ..जान से भी बढकर कुछ अलग तरह का प्यार करती थी ,निभा पर किसी और का अधिकार जताना उन्हें पसंद ना था ।

    इसी बीच आगे की पढाई के लिए निभा को होस्टल जाना पड़ा। निभा के बिना माँ की तबियत खराब रहने लगी …अजीब तरह के कश्मकश से गुजर रही थीं ।एक दिन पति के साथ बाजार जा रही थी ,रास्ते मे हुबहू निभा के जैसी कोई लड़की दिखी…चलती गाड़ी से कूद गई और पीछे से आते ट्रक का पहिया सीधे उनके उपर चढ़ गया …पलक झपकते हीं प्राण पखेरु उड़ गए ।एक हँसता खेलता परिवार खत्म हो गया…।

    माँ के निधन की खबर सुनते ही निभा होस्टल से घर आती है ।पिता के कंधे से चिपकर बहुत रोती है । श्राद्ध के दुसरे दिन माँ की याद में एक वृद्ध आश्रम में खाना और कंबल बाँटने अपने चचेरे भाईयों के साथ जाती है तो वहाँ अपने दादाजी को देखती है,… आश्चर्यचकित हो वह लपककर उनकी तरफ बढ़ती है और विस्मय होकर पुछती है ,” अरे दादाजी आप यहाँ क्या कर रहे हैं….?

    आप तो चाचाजी के पास थे ना …..तभी दोनों चचेरे भाई तुरंत बोल पड़ते हैं..,” अरे नहीं दीदी दादाजी तो गाँव मे रहने चले गये थे ..ऐसा पापा बता रहे थे ।निभा को भी कुछ समझ में नहीं आता है कि माँ पिता ने झूठ क्यो बोला था उससे बचपन में ।दादा बच्चों को देखकर रोने लगते हैं …अपने समय का वो सरकारी अफसर उसकी आँखो से आँसुओ की अविरल धारा बह रही थी ….उसने तो इस जन्म में बच्चों से मिलने का आस हीं छोड़ रखा था ।

    निभा घर आती है ,पिता और चाचा से सीधे पुछती है ,” घर में इतना बड़ा घटना घट गया मगर चाचाजी दादाजी नहीं दिखे ।” “बचपन में पापा ने बताया था वो आपके पास रहने चले गए हैं…आप उनको लेकर नहीं आएँ ।” दोनो भाई एक दुसरे का मूँह देखने लगते हैं….. उनके कुछ बोलने से पहले वो बोलती है ,” आज माँ के श्राद्ध का खाना जिस वृद्ध आश्रम में देने गये थे वहाँ दादाजी को देखे हैं ….सच कौन बतायेगा आपदोनो में से ,ये सोच लिजिए..।

    पिता ही आगे बढ़ते हैं और बेटी से बोलते हैं , ” तेरे दादाजी के लक्षण सही नहीं थे कुछ गलत आचरण था उनका इसीलिए उनको वहाँ डाल दिए थे।तेरी माँ भी उनको पसंद नहीं करती थी । उनका पुरा खर्च उठाए थे हमलोग बस साथ में नहीं रखे …पड़ोसियों से पुछ लो मैं सही बोल रहा हूँ ….। ” यह सुनकर बेचारी कोमलांगी निभा सन्न हो जाती है कि एक बेटा अपने पिता के बारे में ऐसे कैसे बोल सकता है ।

    यह सब सुनकर वह तुरंत बोलती है ,” पापा अगर दादा वैसे थे तो आपको घर छोड़ देना चाहिए था ..ना। यह घर दादाजी का है और उनको ही हक है इस घर में रहने का ..ना कि आपका ..।”

    मुझे दादाजी ने सब बताया है आपने और चाचाजी ने मिलकर सारी सम्पत्ति बाँट ली है और ये घर भी आपलोगों ने अपने नाम करा लिया है जबरदस्ती उनका हस्ताक्षर लेकर ।और उनको जानबूझकर बदनाम कर दिया है । छी: “धिक्कार है मुझे कि ….मैं आपकी बेटी हूँ । आपदोनो सम्पत्ति के लिए इतना गिर जायेंगे मैने सपने में भी नहीं सोचा था । मैं यहाँ से जा रही हूँ आपलोग को यह घर मुबारक ।”

    निभा एक फैसला लेती है और दृढ़ निश्चय के साथ उसके कदम वृद्ध आश्रम की तरफ बढ़ जाते हैं ।

  • चूहा हो या छिपकली मक्खी हो याˈ मच्छर चींटी हो या कॉकरोच। बिना ज़हर और खर्चे के तुरंत जायेंगे भाग आज ही अपनाये ये आसान नुस्खाˌ

    चूहा हो या छिपकली मक्खी हो याˈ मच्छर चींटी हो या कॉकरोच। बिना ज़हर और खर्चे के तुरंत जायेंगे भाग आज ही अपनाये ये आसान नुस्खाˌ

    चूहा हो या छिपकली मक्खी हो याˈ मच्छर चींटी हो या कॉकरोच। बिना ज़हर और खर्चे के तुरंत जायेंगे भाग आज ही अपनाये ये आसान नुस्खाˌ

    आज हम आपको बतायेंगे की आप अपने घर से मक्खी, मच्छर, चींटी, क्रॉकरोच, छिपकली और चूहे को कैसे भगा सकते है। किसी को भी अपने घर में छिपकली या कॉकरोच दिखना अच्छा नहीं लगता। ये वास्तव में बहुत बड़ी परेशानी है तथा इनके साथ कई हानिकारक रोगाणु और सूक्ष्म जीव भी घर में आ जाते है।

    हालाँकि छिपकली घर में रहने वाली मक्खियों और कीड़ों से छुटकारा दिलाती है परंतु फिर भी ये घर की दीवारों पर घूमती हुई अच्छी नहीं लगती। हम सभी छिपकली और कॉकरोच से छुटकारा पाने के लिए प्रभावी उपाय जानना चाहते हैं क्योंकि ये बिन बुलाये मेहमान घर में ऐसे घूमते हैं जैसे घर इनका ही हो। बाज़ार में कई तरह के इन्सेक्ट और छिपकली निरोधक (रिपेलेंट) उपलब्ध हैं परंतु ये सभी हानिकारक रसायनों से बने होते हैं तथा विषैले होते हैं।

    यदि आपके घर में बच्चे या पालतू जानवर हैं तो इनका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए। आज इस लेख में हम आपको छिपकली, मक्खी, चिंटी, खटमल, चूहों, मच्छरो और कॉकरोच से छुटकारा पाने के उपायों के बारे में बताएँगे जो न केवल सस्ते हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। अपने घर से इन सभी को हमेशा के लिए दूर रखने के लिए ये उपाय अपनाएँ। छिपकली, मक्खी, चिंटी, खटमल, चूहों, मच्छरो और कॉकरोच से छुटकारा पाने के घरेलू उपाय

    1. कॉकरोच इस उपाय के डर से घबराये : खाली कॉलिन स्प्रे की बोटल में नहाने वाली साबुन का घोल भर लें । कॉकरोच दिखने पर उनके ऊपर इसका स्प्रे कर दें । साबुन का यह घोल कॉकरोच को मार देता है । रात के समय सोने से पहले वॉशबेसिन आदि के पाईप के पास भी इस घोल का अच्छी मात्रा में स्प्रे कर देना चाहिये ऐसा करने से कॉकरोच नाली के रास्ते घर में अंदर नही घुस पायेंगे।

    2. चींटी नही आयेगी घर मे : चींटी अगर घर में एक जगह बना लेती हैं तो जगह जगह से निकलने लगती हैं। चींटी के रास्ते बंद करने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि उनके निकलने की जगह पर एक दो स्लाईस कड़वे खीरे के रख दें। कड़वे खीरे की महक से चींटी दूर भागती हैं और जब उनके निकलने की जगह पर ही यह स्लाईस रखा होगा तो वे निकलेंगी ही नहीं। चींटियों के बिल के मुहाने पर लौंग फँसा कर रखदेने से चींटियॉ उस रास्ते का प्रयोग करना ही बंद कर देती हैं ।

    3. मक्खियाँ निकट भी ना आये : घर में उड़ने वाली मक्खियों से मुक्ति पाने के लिये नीम्बू का इस्तेमाल करना चाहिये । नीम्बू मक्खियों को दूर करने का बहुत कारगर उपाय है । घर में पोछा लगाते समय पानी में 2-3 नीम्बू का रस निचोड़ देना चाहिये । नीम्बू की महक से कई घण्टे तक मक्खियॉ दूर रहती हैं और घर में ताजगी का भी अहसास होता रहता है ।

    4. मच्छर को भगाये : मच्छर भगाने के लिये कमरे मे नीम के तेल का दीपक सावधानी के साथ जलायें इसके अलावा ऑलआउट की खाली बोतल में भी नीम का तेल भरकर मशीन में लगाकर प्रयोग किया जा सकता है । जो कि पूरी तरह सुरक्षित है । 6. घरेलु कीटों के इंफेक्शन से बचाव : घर से सभी तरह के इंफेक्शन को खत्म करने के लिये आम की सूखी टहनी पर कपूर और हल्दी पाउडर दालकर सुलगाना चाहिये। इस दौरान छोटे बच्चों को ध्यान से आग से दूर रखना चाहिये। यह प्रयोग किसी बड़े के द्वारा ही किया जाना चाहिये। लगभग 12 इंच लम्बी टहनी को जलाना पर्याप्त होता है । 7. चूहे से छुटकारा : पुदीना : पुदीना यदि चूहे ने पूरे घर में आतंक सा फैला दिया है तो आप इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए पुदीने की पत्ती या फूल को लेकर कूट लें और इसे चूहे के बिल के पास या आने वाली जगहों के पास रख दें। इसकी गंध को पाकर चूहे तुरंत ही भाग जायेगें। तेज़ पत्ता : वैसे तो तेज पत्ते को चावल यां सब्जी में डाला जाता है लेकिन चूहे भगाने के लिए भी यह कारगर साबित होता है। लाल मिर्च : लाल मिर्च खाने में प्रयोग होने वाली लाल मिर्च चूहों को भगाने के लिए काफी कारगर है।

    जहां से चूहें ज्यादा आते है वहां पर लालमिर्च का पाउडर डाल दें इतना करने से चूहें घर में नहीं घर से बाहर जाते दिखेंगे। फिनाइल की गोलियां : फिनाइल की गोलियों को कपड़ों में रखकर चूहों से बचाया जा सकता है। इस तरह से चूहें घर में भी नहीं आएंगे। इंसानों के बाल : चूहों को घर से भगाने का सबसे असान तरीका है इंसानों के बाल। आप जानकर भले ही आपको आश्चर्य होगा पर चूहों को भगाने का यह सबसे सही तरीका है क्योंकि इंसानों के बाल से चूहे भागते हैं। क्योंकि इसको निगलने से इनकी मौत हो जाती है इसलिए इसके नजदीक आने से ये काफी डरते है। प्याज : घर की सफाई के बाद भी, चूहों से परेशान हैं यदि आप चूहों को मारने के लिए रेट किल और पिंजरे का इस्तेमाल करके थक चुके हैं, तो आज हम आपको कुछ घरेलू तरीके बताएंगे जिससे आप घर से चूहों से छुटकारा पा सकते हैं। चूहे प्याज की गंध बिल्कुल पसंद नहीं करते। चूहे प्याज से बहुत दूर भागते हैं प्याज के टुकड़े वहाँ रखें जहां से चूहों आपके घर में आते हैं। छिपकली नज़र भी ना आये :

    अंडे के छिलके : छिपकलियाँ अंडे के छिलकों की गंध से दूर भागती हैं। दरवाजों तथा खिड़कियों और घर में एनी स्थानों पर अंडे के छिलके रख देने से छिपकली घर के अंदर नहीं घुसती। लहसुन : छिपकली लहसुन की गंध से भी दूर भागती हैं। छिपकलियों को घर से दूर रखने के लिए घर में लहसुन की कलियाँ टांगें या घर में लहसुन के रस का छिडकाव करें। कॉफ़ी और तंबाकू की छोटी गोलियाँ : कॉफ़ी तथा तंबाकू के पाउडर की छोटी छोटी छोटी गोलियाँ बनायें तथा इन्हें माचिस की तीली या टूथपिक पर चिपका दें। इन्हें अलमारियों में या ऐसे स्थान पर रख दें जहाँ छिपकली अक्सर दिखाई देती है। यह मिश्रण उनके लिए जानलेवा होता है इसलिए आपको बाद में उनके मृत शरीर को फेंकना पड़ेगा। ये सरल उपाय अपनायेंगे तो निश्चित ही आप अपने घर से कॉकरोच, मक्खी, मच्छर, छिपकली, चूहों आदि अनचाहे मेहमानों को दूर रख सकते हैं और उनकी विदाई हमेशा के लिए कर दे। एक बार आजमा कर जरूर देखें।

  • ना ऑक्सीजन, ना पानी.. फिर भी जिंदा!ˈ धरती का ‘बाहुबली है ये जीव, साइंस भी हैरानˌ

    ना ऑक्सीजन, ना पानी.. फिर भी जिंदा!ˈ धरती का ‘बाहुबली है ये जीव, साइंस भी हैरानˌ

    ना ऑक्सीजन, ना पानी.. फिर भी जिंदा!ˈ धरती का ‘बाहुबली है ये जीव, साइंस भी हैरानˌ

    अगर आपको लगता है कि इंसान धरती का सबसे ताकतवर जीव है, तो जरा ठहरिए क्योंकि धरती पर एक ऐसा सूक्ष्म प्राणी मौजूद है जो विज्ञान के तमाम नियमों को चुनौती देता है. इसे टार्डिग्रेड (Tardigrade) कहा जाता है, और इसे प्यार से “वॉटर बीयर” भी बुलाते हैं. नाम जितना प्यारा, इसकी ताकत उतनी ही हैरान कर देने वाली है, वैज्ञानिक भी इसकी क्षमता देखकर दंग रह जाते हैं.

    जहां इंसान 40 डिग्री तापमान में पसीना-पसीना हो जाता है, वहीं टार्डिग्रेड लगभग 150°C (300°F) तक की गर्मी भी झेल सकता है. खौलते पानी में डाल दो, ज्वालामुखी की राख में छोड़ दो या फिर अंतरिक्ष की ठंड में फेंक दो ये जीव आसानी से मरता नहीं है. साल 2007 में वैज्ञानिकों ने हजारों टार्डिग्रेड्स को एक सैटेलाइट के ज़रिए अंतरिक्ष में भेजा था. सबको लगा था कि लौटने तक ये नष्ट हो जाएंगे, लेकिन जब सैटेलाइट वापस आई, तो न सिर्फ ये जीवित थे बल्कि कुछ ने तो अंडे भी दे रखे थे.

    टार्डिग्रेड आमतौर पर गीली मिट्टी या काई में पाया जाता है. जब इसके आस-पास का पानी सूख जाता है, तो ये खुद को एक निष्क्रिय अवस्था में डाल लेता है. जिसे क्रिप्टोबायोसिस (Cryptobiosis) कहा जाता है. इस अवस्था में ये बिना पानी, बिना ऑक्सीजन और बिना भोजन के सालों तक जिंदा रह सकता है. जैसे ही दोबारा नमी मिलती है, इसकी कोशिकाएं फिर से सक्रिय होकर जीव को “जिंदा” कर देती हैं.

    टार्डिग्रेड के शरीर में एक खास जीन पाया गया है जिसे पैरामैक्रोबियोटस कहा जाता है. यह जीन टार्डिग्रेड को खतरनाक यूवी किरणों और रेडिएशन से बचाता है.इसकी खासियत यह है कि यह हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों को अवशोषित करके उन्हें नीली रोशनी में बदल देता है.यानी नुकसान पहुंचाने से पहले ही खतरे को बेअसर कर देता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह जीन अन्य जीवों में स्थानांतरित किया जा सके, तो वे भी चरम परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं.

    टार्डिग्रेड को वैज्ञानिक अब तक का सबसे सहनशील और मजबूत जीव मानते हैं. यह न रेडिएशन से डरता है, न आग से, न बर्फ से, जैसे मानो प्रकृति ने इसे “सुपरपावर” देकर बनाया हो. एक ऐसा जीव जो लगभग किसी भी स्थिति में जिंदा रह सकता है.

  • गाँव के छोर पर बंसी काका रहतेˈ थे। उम्र ढल चुकी थी, मगर हिम्मत अब भी बैल जैसी थी। बेटे शहर का रुख कर चुके थे, खेत-खलिहान भी धीरे-धीरे बिक-बिक कर कम हो चले थे। अब उनके पास बस एक कच्चा मकान था, थोड़ा-सा आँगन और उनकी सबसे बड़ी साथी—बकरी लालीˌ

    गाँव के छोर पर बंसी काका रहतेˈ थे। उम्र ढल चुकी थी, मगर हिम्मत अब भी बैल जैसी थी। बेटे शहर का रुख कर चुके थे, खेत-खलिहान भी धीरे-धीरे बिक-बिक कर कम हो चले थे। अब उनके पास बस एक कच्चा मकान था, थोड़ा-सा आँगन और उनकी सबसे बड़ी साथी—बकरी लालीˌ

    गाँव के छोर पर बंसी काका रहतेˈ थे। उम्र ढल चुकी थी, मगर हिम्मत अब भी बैल जैसी थी। बेटे शहर का रुख कर चुके थे, खेत-खलिहान भी धीरे-धीरे बिक-बिक कर कम हो चले थे। अब उनके पास बस एक कच्चा मकान था, थोड़ा-सा आँगन और उनकी सबसे बड़ी साथी—बकरी लालीˌ

    गाँव के छोर पर बंसी काका रहते थे। उम्र ढल चुकी थी, मगर हिम्मत अब भी बैल जैसी थी। बेटे शहर का रुख कर चुके थे, खेत-खलिहान भी धीरे-धीरे बिक-बिक कर कम हो चले थे। अब उनके पास बस एक कच्चा मकान था, थोड़ा-सा आँगन और उनकी सबसे बड़ी साथी—बकरी लाली।

    लाली उनके लिए सिर्फ़ जानवर नहीं थी, वह उनका परिवार थी। सुबह की शुरुआत उसकी मे-मे से होती और रात की तन्हाई उसकी साँसों की गर्माहट से कट जाती। बंसी काका उससे बातें करते तो लगता जैसे वह सब समझ रही हो।

    इसी बीच गाँव में मेला लगा। जेब खाली थी, बेटों की तरफ़ से मनीऑर्डर आने में देर थी। पड़ोसी हरिया बोला—
    “काका, लाली को बेच दो। सौ-पचास मिल जाएँगे। दवा-दारू आ जाएगी, घर में भी कुछ सामान आ जाएगा।”

    बंसी काका चुप रह गए। अगले दिन सुबह लाली की रस्सी पकड़कर वह हाट की ओर निकल पड़े।

    हाट के बीचोंबीच कसाई खड़ा था। उसकी नज़र लाली पर टिक गई।
    “कितने की है?” उसने पूछा।

    काका ने लाली की आँखों में देखा। उनमें डर था, जैसे कह रही हो—“काका, तुम भी मुझे छोड़ दोगे?”
    काका की आँखें भर आईं। कसाई ने पैसे आगे बढ़ाए।

    काका ने लाली की गर्दन पर हाथ फेरा, फिर कसाई की ओर देखा और पैसे उसके हाथ से झटक कर ज़मीन पर फेंक दिए।
    “नहीं बेचनी मुझे। मैं भूखा रह लूंगा, पर इसकी सांसों का सौदा नहीं करूँगा।”

    लाली उनके पैरों से लिपट गई। गाँव के लोग खड़े थे, कोई कुछ नहीं बोला, लेकिन सबकी आँखें भीग गईं।

    उस दिन गाँव ने जाना—
    दया केवल धर्म नहीं, बल्कि इंसानियत की असली पहचान है।

  • क्या आप जानते हैं पृथ्वी की वोˈ सड़क जहां से आगे कुछ नहीं है? जानिए दुनिया की आखिरी सड़क से जुड़ी चौंकाने वाली सच्चाईˌ

    क्या आप जानते हैं पृथ्वी की वोˈ सड़क जहां से आगे कुछ नहीं है? जानिए दुनिया की आखिरी सड़क से जुड़ी चौंकाने वाली सच्चाईˌ

    क्या आप जानते हैं पृथ्वी की वोˈ सड़क जहां से आगे कुछ नहीं है? जानिए दुनिया की आखिरी सड़क से जुड़ी चौंकाने वाली सच्चाईˌ

    नई दिल्ली | इस दुनिया का आखिरी छोर कहां है? यह सवाल आप के दिमाग में हमेशा घूमता रहता होगा. आप इस बारे में भी जानना चाहते होंगे कि आखिर यह दुनिया कहां खत्म होती है. ऐसा कौन- सा हिस्सा है जो इस दुनिया को खत्म कर देता है, वहां से आगे कोई प्राणी नहीं रहता. दुनिया की अंतिम सड़क के बाद आखिर यह दुनिया कैसी दिखती है. इन सवालों के जवाब शायद ही किसी के पास होंगे लेकिन आज हम आपको इन्हीं सवालों के जवाब देने जा रहे हैं.

    बता दें यूरोपीय देश नॉर्वे में एक ऐसी सड़क है, जिसे दुनिया की आखिरी सड़क या आखिरी मार्ग के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि इस सड़क के खत्म होने के बाद आपको सिर्फ समुद्र और ग्लेशियर ही नजर आएंगे. इसके अलावा, आगे देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है. इस सड़क को ई- 69 हाईवे (E- 69 Highway) के नाम से जाना जाता है. आइए आपको बताते हैं इस सड़क के बारे में कुछ दिलचस्प बातें.

    नॉर्वे देश को जोड़ती है यह सड़क

    उत्तरी ध्रुव पृथ्वी का सबसे दूर का बिंदु है, जहां से पृथ्वी की धुरी घूमती है और नॉर्वे देश भी इस पर है. E- 69 राजमार्ग नॉर्वे को पृथ्वी के छोर से जोड़ता है. आखिरी सड़क की बात करें तो यहां से यह सड़क ऐसी जगह पर खत्म होती है, जहां से आपको आगे का कोई रास्ता नजर नहीं आता. हर जगह आपको सिर्फ बर्फ ही बर्फ नजर आएगी. सड़क की लंबाई करीब 14 किमी है.

    यहां अकेले जाने की नहीं है इजाजत

    अगर आप ई- 69 हाईवे पर अकेले जाने की सोच रहे हैं और दुनिया का अंत करीब से देखना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एक ग्रुप तैयार करना होगा. तभी आपको यहां जाने दिया जाएगा. इस सड़क पर किसी भी व्यक्ति को अकेले जाने की इजाजत नहीं है और न ही यहां वाहन जा सकते हैं. कारण यह है कि कई किलोमीटर तक जगह- जगह बर्फ की मोटी चादर बिछी रहती है, जिससे यहां गुम होने का खतरा बना रहता है.

    एकदम अलग होता है दिन और रात का मौसम

    यहां दिन और रात का मौसम भी बिल्कुल अलग रहता है. उत्तरी ध्रुव की वजह से यहां सर्दियों में छह महीने तक अंधेरा रहता है जबकि गर्मियों में यहां सूरज लगातार दिखाई देता है. सर्दियों में यहां दिन नहीं होता और गर्मियों में यहां रात नहीं होती. हैरानी की बात ये है कि इतनी मुश्किलों के बाद भी यहां कई लोग रहते हैं. इस जगह पर सर्दियों में तापमान माइनस 43 डिग्री और गर्मियों में जीरो डिग्री तक पहुंच जाता है.

    रास्ते में बन चुकी हैं कई जगह होटल

    कहा जाता है कि अलग- अलग जगहों पर डूबते सूरज और ध्रुवीय स्थलों को देखने में बहुत मजा आता है. कहा जाता है कि पहले इस जगह पर मछली का कारोबार होता था लेकिन 1930 के बाद यहां विकास होने लगा. 1934 के आसपास यहां पर्यटक आने लगे. अब आपको इस जगह पर कई होटल और रेस्टोरेंट भी मिल जाएंगे.

  • नींबू का पौधा सूखा-सूखा लग रहा है?ˈ अपनाओ ये 5 देसी उपाय और तैयार हो जाओ बंपर फसल के लिएˌ

    नींबू का पौधा सूखा-सूखा लग रहा है?ˈ अपनाओ ये 5 देसी उपाय और तैयार हो जाओ बंपर फसल के लिएˌ

    नींबू के पौधे का विकास अगर रुक गया तो चलिए इस लेख में आपको ऐसे पांच काम बताएंगे जिन्हें करने से पौधे का विकास तेजी से बढ़ जाएगा, फल, फूल की मात्रा भी अधिक देखने को मिलेगी-

    नींबू का पौधा सूखा-सूखा लग रहा है?ˈ अपनाओ ये 5 देसी उपाय और तैयार हो जाओ बंपर फसल के लिएˌ

    नींबू का पौधा

    नींबू के पौधे को बढ़िया विकास देने के लिए कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जिसके बारे में इस लेख में आपको जानकारी दी जाएगी। नींबू का पौधा लोग घर पर आसानी से लगा सकते हैं। इसे जमीन के आलावा गमले में भी लगाया जा सकता है। नींबू की कुछ ऐसी भी वैरायटी आती है जो कि साल में दो बार फल देती हैं। लेकिन उसके लिए भी समय पर कुछ काम करने पड़ते हैं।

    अगर आपने पौधा लगाया हुआ है और वह दो-तीन माह का हो गया है, उसका विकास रुका हुआ है या आपका पुराना पौधा है और उसमें फल, फूल नहीं लग रहे हैं या फल, फूल की मात्रा कम है तो चलिए आपको ऐसे पांच उपाय बताते हैं जिन्हें करने के बाद फल, फूल खूब आएंगे और पौधे का विकास भी तेजी से होने लगेगा।

    नींबू के पौधे में धूप

    नींबू के पौधे का अच्छा विकास हो इसके लिए धूप की जरूरत होती है। कम से कम 6 से 8 घंटे पौधे को धूप लगेगी, तभी उसका विकास बढ़िया तरीके से हो सकेगा। धूप पत्तियों में पड़ती है तो पत्तियों द्वारा भोजन सही समय पर बनता है और पौधे को पोषण मिलता है। जिससे विकास भी बेहतर तरीके से समय पर होता है। इसलिए नींबू का पौधा छांव वाली जगह पर नहीं लगाना चाहिए। धूप वाली जगह पर लगाना चाहिए। गमले में लगाया है तो धूप जहां पर आती हो 6 से 8 घंटे की वहां रखें।

    नींबू के पौधे में पानी

    नींबू का पौधा लगाया हुआ है तो पानी का ध्यान रखना चाहिए। पौधे को पानी जरूरत के अनुसार देना चाहिए। ध्यान रखें जब ऊपर से एक दो इंच की मिट्टी सूख जाती है तब पौधे में पानी देना चाहिए। रोजाना पौधे में पानी नहीं देना चाहिए। जरूरत से ज्यादा पानी देने से नींबू के पौधे का विकास तो रुक ही जाता है और भी कई तरह की समस्या उत्पन्न होती है।

    पानी देते समय यह ध्यान रखें कि जब भी पानी दे बढ़िया से गमले की पूरी मिट्टी भीग जाए और नीचे जो आपके गमले में छेद बने हुए हैं उनसे पानी निकल जाए। यानि की पानी की निकासी की व्यवस्था भी बढ़िया होनी चाहिए। वह लोग जो नींबू के पौधे को बहुत ज्यादा पानी देते हैं तो पौधे की जड़े सड़ने की समस्या भी आ जाती है।

    गमले का आकार

    नींबू का पौधा जिन लोगों ने गमले में लगाया तो उन्हें गमले के आकार का ध्यान रखना चाहिए। छोटा गमला है तो विकास भी धीरे होगा। पौधे में फल फूल की मात्रा भी कम दिखाई पड़ेगी। अगर गमलें का आकार बड़ा होगा तो पौधे को भी पोषण ज्यादा मिलेगा। जिसमें 15 बाय 15 या 18 बाय 18 इंच का गमला या ग्रो बैग लेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।

    नींबू के लिए खाद

    किसी भी पौधे के बढ़िया विकास के लिए उसे समय पर खाद देना चाहिए। अगर समय पर खाद देंगे तो पौधे का विकास भी बेहतर होगा। पौधे में फूल की मात्रा भी अधिक आएगी। फल भी ज्यादा आएंगे। जिसमें बागवानी के एक्सपर्ट बताते हैं कि नींबू के पौधों को साल में चार बार खाद दे सकते हैं। जिसमें वर्मी कंपोस्ट, नीम खली, सरसों की खली, बोन मील और एप्सम सॉल्ट मिलाकर एक बढ़िया सा मिश्रण तैयार करके पौधे की मिट्टी में मिलाये और फिर ऊपर से हल्की सड़ी मिट्टी डालकर पानी दे।

    पौधे की प्रूनिंग

    पौधे के विकास के लिए, पौधे को घना करने के लिए, नई शाखाएं लाने के लिए, समय-समय पर प्रूनिंग करते रहना चाहिए। प्रूनिंग के अलावा मिट्टी की गुड़ाई और खरपतवार भी निकालते रहना चाहिए। प्रूनिंग आप साल में दो बार कर सकते हैं। अभी से लेकर तक का समय सही रहेगा। उसके बाद जून में भी कर सकते हैं। बरसात में बढ़िया पौधे का विकास देखने को मिलेगा।